Friday, August 29, 2008

विदेशों में भी पसरने लगी माया की माया

माया की माया को देश ही नहीं विश्व में भी लोकप्रियता मिलती नजर आ रही है। मायावती जहां सोनिया गांधी से बैर लेकर देश की पहली दलित महिला प्रधानमंत्री बनने के सपने पाले बैठी हैं, वहीं फोब्स की सूची में उनका नाम आने से उनके हौसले बढ़े हैं। मायावती को फॊर्ब्स पत्रिका ने विश्व की 100 ताकतवर महिलाओं में शामिल किया है। खास बात यह है कि सोनिया गांधी की रेटिंग में गिरावट दर्ज की गई है। छठवें स्थान से फिसलकर वे 21वें स्थान पर पहुंच गई है। मायावती को पत्रिका ने 59वें पायदान पर रखा है।

मायावती की इस उपलब्धि के पीछे उनके राजनीतिक कौशल और सोशल इंजीनियरिंग को माना जा रहा है। पत्रिका ने माया के वैक्तित्व का बखान करते हुए लिखा है कि उन्होंने देश की सबसे ताकतवर महिला सोनिया गांधी की सत्ता को हिलाने और उनकी पोजिशन को चुनौती दी है। मायावती ने हाल ही में लोकसभा में विश्वासमत के दौरान कांग्रेस के नाक में दम कर दिया था। सभी राजनीतिक दलों ने आस लगाई थी कि सबसे ज्यादा सांसद अगर किसी पार्टी के टूटेंगे तो वह बसपा के होंगे लेकिन ऐसा हुआ नहीं। बल्कि मायावती ने उलटे सपा के शहिद सिद्धकी को अपने पाले में जरूर कर लिया। इससे पहले कांग्रेस के अखिलेश दास और नरेश अग्रवाल भी पार्टी में आ चुके हैं।

जानकारों का मानना है कि मायावती का कद अचानक नहीं बढ़ा है। इसके पीछे एक रणनीति थी जो लगातार काम कर रही थी। चाहे वह कांशीराम के समय हो या फिर मायावती के समय। बसपा ने अपने पहले चरण में दलितों को यह बताने की कोशिश की कि वे भी समाज में उसी तरह जीने के हकदार हैं जितने अन्य लोग। इसका परिणाम यह रहा कि मायावती को देश के सबसे बड़े प्रदेश उत्तर प्रदेश की बागडोर संभालने का मौका मिला। उस समय मायावती की उम्र महज 39 वर्ष थी। दलित वोटरों ने मायावती को पहली दलित महिला मुख्यमंत्री तो बना दिया लेकिन वे ज्यादा समय तक काम नहीं कर पाईं और सरकार गिर गई। इस समय मायावती और उनकी बसपा ने सवर्णो को जमकर गरियाया। तिलक, तराजू और तलवार इनको मारो जुते चार का नारा दिया गया।

अगले चरण में मायावती और बसपा को यह समझ में आने लगा की बराबरी के बाद सत्ता को स्थिर रखने के लिए सवर्णो को साथ लेना होगा। राजनीति में माहिर माया ने सोशल इंजीनियरिंग का फार्मूला तय किया। सवर्ण जो लंबे समय से दलित और मुसलिम तुष्टिकरण के कारण हासिए पर जा रहे थे, उन्होंने झट मायावती का दमन थाम लिया। माया ने इस बार उनको बराबरी का सम्मान देने की बात कही। उत्तर प्रदेश में अपने दम पर सरकार बनाकर दलितों और सवर्णो ने मायावती को यह बता दिया कि इस समीकरण का देश में कोई काट नहीं है।

अब फॊर्ब्स पत्रिका ने भी मायावती को टाप 100 लेकर उनके हौंसले को और बुलंद किया है। उत्तर प्रदेश सहित देश के अन्य भागों में उनके समर्थकों में जोरदार उत्साह का माहौल है। पहले से ही जोश से लबरेज माया को मिले इस टानिक का अन्य राजनीतिक दल किस प्रकार काट खोजते हैं यह आने वाले समय में देखने को मिलेगा।

Saturday, August 9, 2008

माया ने दिखाई माया एक उत्तराधिकारी बनाया

मायावती ने आज ये कहकर सबको चौंका दिया कि उन्होंने अपना उत्तराधिकारी चुन लिया है। मायावती ने ये भी कहा कि उनका उत्तराधिकारी दूसरी पार्टियों की तरह उनके ही परिवार का नहीं होगा। उसकी उम्र १८ साल है और वह उनकी ही जाति का है। माया की यह घॊषणा एक तरह से कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी पर सीधी चोट है।


मायावती ने दहाड़कर कहा कि उनका राजनीतिक उत्तराधिकारी एक सामान्य दलित परिवार से होगा। उसमें भी वो चमार जाति से है। उसे वो पिछले कुछ सालों से तैयार कर रही हैं लेकिन उसका नाम उनके मरने या गंभीर रूप से बीमार होने की स्थिति में ही पता चलेगा। साथ ही उन्होंने ये भी कहा कि उसका नाम उनके अलावा पार्टी के सिर्फ दो लोगों को पता है।

अब मायावती से 18 साल छोटा उनका ये राजनीतिक उत्तराधिकारी सचमुच कहीं है या फिर वो सिर्फ शगूफा छोड़ रही हैं। इसकॊ लेकर राजनीतिक हलकॊ में चर्चा जॊरॊं पर है। क्योंकि वो अभी नाम किसी को नहीं बताने जा रहीं। लेकिन इतना तो तय है कि बसपा के आंख बंदकर हाथी पर ठप्पा मारने वाले कार्यकर्ताओं को इतना संबल तो बहनजी ने दे ही दिया है कि बहनजी पर कोई विपदा आई भी तो, दलित समाज का एक नया भाईजी उनकी अगुवाई के लिए तैयार है।

जानकारॊं की माने तॊ माया की यह घॊषणा लखनऊ से दिल्ली पहुंचाने के लिए कार्यकर्ताओं कॊ जॊश में लाने का संकेत हॊ सकती है। लेकिन इन सब के बीच वे कार्यकर्ता जॊ सवर्ण समुदाय से आते हैं उनके लिए निराशाजनक है। उन्हे अगर यह लगने लगे की माया के बाद उनका पार्टी में कॊइ रखवाला नहीं रहेगा तॊ इसका असर विपरित पड़ सकता है और इसका फायदा सपा कांग्रेस और भाजपा जैसी पार्टियां उठा सकती है।

Wednesday, August 6, 2008

सपा का ब्राह्मण तुष्टीकरण...

देश की राजनीति में कभी किनारे कर दिए गए ब्राह्मण नेताओं की पूछ अचानक बढ़ गई है. ऐसे में उन ब्राह्मण नेताओं के जन्मदिन भी मनाए जा रहे हैं जिनको कुछ दिनों पहले तक उनकी पार्टी के लोग पूछते भी नहीं थे. राजनीति इस कदर करवट बदलेगी, शायद उन राजनेताओं को भी यह नहीं पता है जो काफी लंबे समय से हासिए पर हैं.

समाजवादी पार्टी में अनजाना चेहरा बन चुके जनेश्वर मिश्र का चेहरा अचानक मीडिया की रौनक बना. कारण था उनका जन्मदिन. लोगों को याद दिलाया गया कि ये वही शख्स हैं जिन्हें लोग कभी छोटे लोहिया के नाम से जानते थे. अचानक जनेश्वर मिश्र को लगा कि वे पुराने दिनों में लौट आए हैं. वही जोश, वहीं रुतबा, वही रौनक. मौके की नजाकत को भांपकर छोटे लोहिया ने बयान भी दे दिया कि सपा सरकार में शामिल नहीं होगी.

छोटे लोहिया का इस तरह का बयान हाल-फिलहाल के वर्षों में नहीं आया. फिर अचानक ऐसा क्या हो गया कि समाजवादी पार्टी के चेहरे रहे मुलायम और अमर सिंह की तरफ से मीडिया का कैमरा मुड़कर ज्ञानेश्वर की ओर पहुंच गया.

दरअसल, जनेश्वर का जन्मदिन मनाना तो एक बहाना है. जानकारों की मानें तो यह सपा का मायावती से लड़ने का एक हथियार है. मायावती की सोशल इंजीनियरिंग का जवाब सपा ने जनेश्वर मिश्र के रूप में खोजने की कोशिश की है. इसका परिणाम रहा कि मिश्र के जन्मदिन पर कैसरबाग कार्यालय से लेकर कानपुर, बनारस, इलाहाबाद, मिर्जापुर, झांसी सहित कई जिलों में कार्यक्रमों का आयोजन किया गया.

दरअसल, मामला ब्राह्मणों के तुष्टीकरण का है. मुलायम को लगने लगा है कि प्रदेश में यादव+मुसलमान गठजोड़ से 39 सीटें निकाली जा सकती हैं और इसमें ब्राह्मण का तड़का लग जाए तो मायावती के प्रधानमंत्री बनने के सपनों को तोड़ा जा सकता है. इसके लिए वो कोई भी हथियार आजमाने को तैयार भी नजर आ रहे हैं.

मुलायम जनेश्वर को मायावती के सतीश मिश्र की काट के रूप में देख रहे हैं लेकिन यह तो समय और उत्तर प्रदेश की जनता ही बताएगी कि सपा की ब्राह्मणों को रिझाने की कोशिश कितनी सफल साबित होती है.

Sunday, July 27, 2008

इस जीत के बाद!

विश्वास मत की बहस और विवाद की धूल जमने के साथ ही राजनीतिक दलों ने अब अपने घरों की सुध लेना शुरू कर दिया है। विपक्ष ने अपने बागी सांसदों को पार्टी से निकाल दिया। सरकार ने विश्वास मत के लिए समर्थन के समय किए वायदे पूरे करने का काम शुरू कर दिया है।


सबसे पहले सबसे अहम सहयोगी द्रविड़ मुनेत्र कषगम की मांग पूरा करने के लिए सेतु सम्रुम पर सुप्रीम कोर्ट में एक नई बात कही कि राम ने ही सेतु तोड़ दिया था। सरकार का यह दावा विश्वास मत के बाद से मूर्छित पड़ी भाजपा को ताजा हवा के झोंके के समान लगा होगा। संसद में बहस के समय जो राजनीतिक ध्रुवीकरण नजर आया मोटे तौर पर उसके अगले लोकसभा चुनाव तक जारी रहने की संभावना है। विश्वास मत में भले ही कांग्रेस और उसके सहयोगी दल जीते हों पर उसका परोक्ष लाभ विपक्ष को भी हुआ है।


सरकार के लिए इस जीत ने संभावना और संकट दोनों के द्वार खोल दिए हैं। एक बात तय मानना चाहिए कि अब चुनाव अपने नियत समय पर होंगे। सरकार के पास अगले नौ महीने मतदाता को लुभाने के लिए हैं। विधानसभा चुनावों में लगातार हार से कांग्रेस के कार्यकर्ताओं में आई निराशा इस जीत से छंटेगी। पार्टी नए उत्साह के साथ एक बार फिर जुटेगी।


कांग्रेस के लिए संकट उसके सहयोगी पैदा करेंगे। चुनाव के नजरिए से अब हर घटक अपनी जायज- नाजायज मांगे पूरी करवाने के लिए दबाव डालेगा। द्रमुक ने इसकी शुरुआत कर दी है। सरकार की नई सहयोगी समाजवादी पार्टी के लिए असली चुनावी रण क्षेत्र उत्तर प्रदेश है और लक्ष्य मायावती का राजनीतिक मानमर्दन है। जसे विश्वास मत में समाजवादी पार्टी ने हर तरह के हथकंडे अपनाने में कोई संकोच नहीं किया। वैसे ही वे चाहेंगे कि केंद्र सरकार की ताकत का हर तरह इस्तेमाल मायावती और बहुजन समाज पार्टी को घेरने में हो। इसके लिए समाजवादी पार्टी कुछ दिनों में केंद्रीय गृह मंत्रालय की मांग करे तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए।


विश्वास मत में विपक्ष की हार ने मुख्य विपक्षी दल भाजपा को अपने घाव सहलाने का समय दे दिया है। सत्तारूढ़ गठबंधन ने सबसे ज्यादा सेंध भाजपा के ही घर में लगाई। कांग्रेस का विकल्प होने का दावा करने वाली भाजपा को पता ही नहीं था कि उसके अपने घर में क्या हो रहा है। कर्नाटक जहां अभी दो महीने पहले वह विधानसभा चुनाव जीती है वहां से भी तीन सांसद पार्टी का साथ छोड़ गए। मान लीजिए कि सरकार विश्वास मत हार जाती तो क्या होता। उस हालत में मायावती, वामदल यूएनपीए और संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सबके निशाने पर भाजपा होती।


हार ने भाजपा को इस हमले से बचा लिया। पार्टी में एेसे लोगों की कमी नहीं है जो सरकार के जीतने से खुश हैं। उनका मानना है कि इससे आडवाणी कमजोर हुए हैं। अब जिस पार्टी में अंदर ही एेसी सोच हो वह क्या तो विकल्प बनेगी और क्या संघर्ष में उतरेगी। दरअसल भाजपा अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व की कमी से अभी तक उबर नहीं पाई है।


आडवाणी को पार्टी ने प्रधानमंत्री पद का दावेदार भले ही घोषित कर दिया हो पर वे पार्टी के स्वाभाविक और निर्विवाद नेता नहीं बन पाए हैं। भाजपा में एक वर्ग ऐसा भी है जो मानता है कि आडवाणी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करने से फायदे की बजाय नुक्सान हुआ है। ऐसे लोगों का मानना है कि वाजपेयी के लौटने का भ्रम बनाए रखना फायदेमंद होता। इस बात को हाल में हुए कर्नाटक विधानसभा के चुनाव में बड़ी शिद्दत से महसूस किया गया। पूरे प्रदेश से वाजपेयी के कार्यक्रम की मांग हो रही थी। पूरे विश्वास मत के दौरान भाजपा दरअसल कहीं भी कांग्रेस से लड़ती नजर नहीं आई तो इस वजह से कि अभी उसके अंदर ही संघर्ष चल रहा है।विश्वास मत के लिए चली राजनीति का सबसे ज्यादा फायदा मिला है बहुजन समाज पार्टी की नेता मायावती को।


राजनीतिक रूप से अछूत बनी मायावती और उनकी पार्टी न केवल राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में आ गई बल्कि वे प्रधानमंत्री पद की दावेदार भी बन गईं। सत्रह सांसद लेकर सात दिन में उनका कद एक सौ तीस सांसदों की पार्टी के नेता आडवाणी से बड़ा नजर आने लगा। पिछले चार साल से जिस तीसरे मोर्चे की बात हो रही थी, वह आकार लेने लगा। मुलायम ¨सह यादव के इस मोर्चे में रहते वामदलों के बावजूद यह मोर्चा क्षेत्रीय ताकतों का मंच नजर आता था।


मायावती के आने से अचानक उसकी राष्ट्रीय छवि नजर आने लगी। इसलिए कि मुलायम सिंह यादव की बनिस्पत मायावती मोर्चे में शामिल सभी दलों के वोट बैंक में कुछ जोड़ने की हैसियत रखती हैं। इसलिए मायावती कांग्रेस के जनाधार के लिए खतरा हैं और भाजपा के नेतृत्व के लिए। प्रकाश करात को इन दोनों से लड़ना है। इसलिए वामदल मायावती के साथ हैं। यह सैद्धांतिक हठवादिता की राजनीति और व्यवहारिक राजनीति का गठजोड़ है।


प्रदीप सिंह

Friday, July 25, 2008

खरीदे वोटों से जीती सरकार

कांग्रेस डीलरों की मदद से डील पर आगे बढ़ने को तैयार है। डीलरों की घिनौनी करतूतों ने लोकतंत्र के मंदिर को शर्मशार कर दिया। ये वहीं डीलर हैं जो लगातार कह रहे थे कि उनके संपर्क में बसपा के तीन सांसद है। शाम होते-होते उनके काले कारनामों का जब खुलासा होता है तो देश की जनता के पास इन करतूतों को देखने के अलावा कोई चारा नहीं बचा था।


डीलरों की इन करतूतों से जहां लोकतंत्र शर्मशार हुई वहीं देश मुस्तकबिल बनने के ख्वाब संजोए मायावती की भी रातों की नींद उड़ गई। लेकिन उन लोगों ने मायावती के साथ भाजपा और वाम दलों को एक ऐसा हथियार दे दिया जिसका लोकसभा चुनावों में भरपूर इस्तेमाल होगा।

मायावती जहां अपने वोटरों को यह कहकर लूभाने की कोशिश करेंगी कि कांग्रेस और उनके सहयोगियों ने दलित की बेटी को देश का मुस्तकबिल बनने से रोक दिया वहीं भाजपा भी इस मुद्दा को भूनाने का पुरजोर प्रयास करेगी।
मध्यप्रदेश, कर्नाटक में सरकार होने के बावजूद भाजपा के सांसदों ने जिस प्रकार सरकार के साथ वोट किया, इसकी सारी कोर कसर भाजपा यह कहकर पूरा करने की कोशिश करेगी कि कांग्रेस ने हमारे सांसदों को खरीदकर अपनी सरकार बचाई है।

वाम दल भी लंबे समय से चाह रहे थे कि सरकार का साथ छोड़े, लेकिन उन्हें मौका हाथ नहीं लग रहा था। करार पर सरकार से समर्थन वापस लेने के बाद उनको लगने लगा था कि इसे चुनावी मुद्दा बनाया जा सकता है लेकिन जब सरकार विश्वास मत जीत गई तो ऐसा लगा कि उनके हाथ से सबकुछ छूट गया लेकिन भाजपा के कारनामे ने उन्हें भी मौका दे दिया कि जीत तो खरीदे हुए वोटे से हुई है।


कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि महंगाई, बिजली पानी नहीं बल्कि करार और शर्मसार हुई संसद को राजनीतिक दल चुनावी मुद्दा बनाकर 15वीं लोकसभा पर कब्जा करने की कोशिश करेंगे।

Saturday, July 12, 2008

विश्वास मत से पहले 'सीबीआई की कार्रवाई क्यों'

बहुजन समाजवादी पार्टी की नेता और उत्तरप्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती का आरोप है कि केंद्र सरकार सीबीआई का दुरुपयोग करके उनके ख़िलाफ़ राजनीतिक साज़िश कर रही है.

शुक्रवार को केंद्रीय जाँच एजेंसी सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि आय से अधिक संपत्ति के मामले में उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती के ख़िलाफ़ मुक़दमा चलाने के लिए उसके पास 'पर्याप्त' सबूत है.

मायावती ने शनिवार को दिल्ली में संवाददाता सम्मेलन में कहा कहा कि ये महत्वपूर्ण है कि पाँच साल से अदालत में चले आ रहे इस मामले में केंद्रीय जाँच ब्यूरो ने बहुजन समाज पार्टी के केंद्र सरकार से समर्थन वापस लेने के बाद ये कदम उठाया है.

उनका ये भी आरोप था कि लोकसभा में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार के विश्वास मत से पहले सीबीआई ने अपने शपथ पत्र की जानकारी मीडिया में 'लीक' की है जबकि उन्हें या उनके वकील को इस बारे में जानकारी अब तक नहीं मिली है.

उनका कहना था कि सीबीआई के उठाए क़दमों का संबंध यूपीए के विश्वासमत हासिल करने के लिए समाजवादी पार्टी के साथ हुए समझौते से है.
उन्होंने आरोप लगाया कि हर चुनाव से पहले केंद्र में सत्तारुढ़ पार्टियाँ चाहे वह कांग्रेस हो या भाजपा बहुजन समाज पार्टी के नेतृत्व के ख़िलाफ़ सत्ता का दुरुपयोग करती हैं.
ग़ौरतलब है कि मायावती ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर इस मामले को ख़ारिज करने की अपील की थी और इसी अपील की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई से जवाब देने को कहा था.

बसपा निशाने पर क्यों?

कांग्रेस और भाजपा जैसी यथास्थितिवादी पार्टियों की ताक़त कम होती जा रही है इसलिए अस्तित्व की लड़ाई लड़ने के लिए वे संवैधानिक संस्थाओं का दुरुपयोग करती हैं

दिल्ली में उन्होंने कहा कि ये पार्टियाँ (कांग्रेस-भाजपा) न केवल सत्ता का दुरुपयोग करती हैं बल्कि संवैधानिक मर्यादाओं का उल्लंघन करते हुए संवैधानिक संस्थाओं का भी दुरुपयोग करती हैं.

उन्होंने कहा, "बहुजन समाज पार्टी इसलिए निशाने पर रहती है ताकि उसका मानवता का आंदोलन, सर्वजन हिताय-सर्वजन सुखाय आंदोलन आगे न बढ़ने पाए."
उनका कहना था, "कांग्रेस और भाजपा जैसी यथास्थितिवादी पार्टियों की ताक़त कम होती जा रही है इसलिए अस्तित्व की लड़ाई लड़ने के लिए वे संवैधानिक संस्थाओं का दुरुपयोग करती हैं."

उनका कहना था कि सीबीआई ने आय से अधिक संपत्ति के मामले में जो शपथ पत्र दाखिल किया है उससे जनता के बीच एक भ्रांति फैल रही है और इसलिए उन्होंने मीडिया के माध्यम से अपनी बात रखनी पड़ रही है. उनका कहना कि अन्यथा सर्वोच्च न्यायालय में मामला लंबित होते हुए वे इस तरह से पत्रवार्ता नहीं करतीं.

समाजवादी पार्टी की शर्त?

अपनी पत्रवार्ता में मायावती ने कई सवाल उठाए. एक तो उन्होंने कहा कि जब सीबीआई के पास जबाव दाख़िल करने के लिए दस दिनों का समय बचा था तो क्यों दस दिन पहले जवाब दाख़िल किया गया. कहने को तो सीबीआई देश की सर्वोच्च जाँच एजेंसी है लेकिन वह केंद्र के मुलाज़िम की तरह कार्य करती है

उनका आरोप है कि विश्वासमत को देखते हुए ऐसा किया गया है वरना तो यह मामला सीबीआई के पास पाँच सालों से है. उन्होंने कहा कि सीबीआई ने जवाब की प्रति मीडिया को तो एक दिन पहले उपलब्ध करवा दी लेकिन बसपा के पास यह जवाब अभी तक नहीँ आया है.

मायावती ने आरोप लगाया, "कहने को तो सीबीआई देश की सर्वोच्च जाँच एजेंसी है लेकिन वह केंद्र के मुलाज़िम की तरह कार्य करती है." उन्होंने आरोप लगाया कि समाजवादी पार्टी ने यूपीए सरकार को समर्थन देने की शर्त रखी है कि उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई की जाएगी. बसपा नेता ने एक अख़बार की रिपोर्ट के हवाले से कहा कि समाजवादी पार्टी सीबीआई में अपना डायरेक्टर नियुक्त करवाना चाहती है.
बीबीसी से सभार

Sunday, June 29, 2008

हर माह हसरतों का लहू चूसता रहा...

चारो तरफ बिखरे पत्थरों और हरे पेड़-पौधों की आत्माएं, धराशाई ईमारतों और सपनों के मलबे, सरकारी बुल्डोजरों से ध्वस्त होते निर्माण और न्याय, डायनामाइट से उड़ाया जाता राज-धन और लोक-मन, और राजपथ पर आत्मसमर्पित लोकतंत्र और नैतिकता... यह लखनऊ है या कि बगदाद?चारो तरफ भूख और मरी के बीच गिद्ध-राजनीति का त्रासद शोर, हूटरों और सायरनों की फासीवादी हुआं-हुआं के बीच किसानों के आत्म-उत्सर्ग की सांय-सांय, महारानी को धूल से बचाने के लिए बार-बार धुलती सड़क के बीच प्यास के रेगिस्तान में घिसटती आम जिंदगी... यह उत्तर प्रदेश है या कि सोमालिया?

चारों तरफ सरकारी ढिंढोरचियों के कर्णभेदी प्रसारणों के बीच लोकतांत्रिक स्वर के उच्चारण पर मर्मभेदी उत्पीड़न, राज प्रायोजित मुजरों के लिए प्रेक्षागृह और जन आयोजन की पहल करने वालों को यातनागृह, खुद की प्रतिमा स्थापित करने के राजतंत्रीय आयोजनों की हद और लोकतंत्र का प्रतिमान स्थापित करने के लिए तमाम जद्दोजहद...! यह अपना प्रदेश है या कि म्यांमार या कि चीन?इन सवालों के साथ मायावती सरकार का एक साल आज पूरा हो गया। इस एक साल में जो हुआ उसका सच और उस सच पर चस्पा ये सवाल बाकी के चार साल की सिहरन देते हैं। आज किस्म-किस्म के राज-जश्न हो रहे हैं। राज-जश्न पर सवार यक्ष प्रश्न अब जवाब नहीं चाहते, निराकरण मांगते हैं।

राज-प्रचारित छदूम उपलब्धियों के बरक्स असलियत चीख-चीख कर इन सवालों का खोखला जवाब नहीं, ठोस हल मांगती है। हम साल भर की हकीकत का कुछ हिस्सा आपके समक्ष पेश करने का साहस कर रहे हैं, यह जानते-समझते हुए कि हमारे रास्ते में उगा दिए गए हैं कितने ढेर सारे बबूल के जंगल!मायावती के शासन का आज एक साल पूरा हो रहा है। इस एक साल में हुआ क्या?

इस एक साल में आम आदमी की उपलब्धियां क्या रहीं और सत्ताधारिणी की उपलब्धियां क्या रहीं? सरकारी भांड सरकार की उपलब्धियां गिनाएंगे, लेकिन जनता ने इस एक साल में क्या पाया उसकी हम जमीनी समीक्षा तो कर ही सकते हैं। यह हमारा लोकतांत्रिक कर्तव्य है। हम अधिकार की बात करने के फैशन से दूर के हैं।'डेली न्यूज़ ऐक्टिविस्ट’ ने साल भर में सामने आए वे सारे मसले उठाए हैं, जो आम आदमी से जुड़े हैं।

पत्थर की मूर्तियों से राजधानी को पाट देने का मसला हो या केंद्र की बिना सहमति लिए किसानों का 28 हजार 510 हेक्टेयर खेत पाट कर गंगा एक्सप्रेस वे बनाने का मसला। बुंदेलखंड की भुखमरी और किसानों की आत्महत्याओं का मसला हो या छात्रों पर पुलिस फायरिंग, छात्र संघ पर प्रतिबंध और व्यापारियों पर वैट का मसला। विकास प्राधिकरण और नगर निगम के नियम-कानून ध्वस्त कर देने का मसला हो या कानून व्यवस्था से लेकर राजधानी की आबोहवा तक के विध्वंस का मसला। सारे पहलुओं की हमने जमीनी समीक्षा का प्रयास किया है।

इन जरूरी मसलों में लोकतांत्रिक व्यवस्था के अलमबरदार का जन्मोत्सव, अथरेत्सव, उपहारोत्सव, नृत्योत्सव, दंडवतोत्सव और लोकतंत्र का विसर्जनोत्सव निश्चित रूप से शामिल है।दलित मसला भी अहम मसलों में से एक है। दलितों के हित के नारे लगा लगा कर मजबूत बनी बहुजन समाज पार्टी ने जिस तरह रंग बदल कर मनुवाद को अंगीकार किया उससे पार्टी के असली रंग का पता चला। यह साफ हो गया कि कौन से वर्ग का हित साधती है बसपा।

सत्ताधारिणी मायावती के अर्थ-सामर्थ्य का ग्राफ तथाकथित कुलीनवाद की परिधि फाड़ता हुआ ऊपर से ऊपर निकलता चला जा रहा है। 2007 के चुनाव नामांकन पत्र में की गई घोषणा और इस साल के इंकम टैक्स रिटर्न के आय-आकलन को ही सामने रखें तो मुख्यमंत्री मायावती की व्यक्तिगत आय 52 करोड़ से बढ़ कर 60 करोड़ रूपए हो गई है। यह आय मायावती को देश की शीर्ष कमाऊ हस्तियों में शुमार करती है। हम आय के अनधिकृत आंकड़े की कल्पना कर सकते हैं, जिक्र नहीं कर सकते। जन्मोत्सव से लेकर किस्म किस्म के उत्सवों में गिर पड़ने वाले उपहारों के आर्थिक आंकड़ीय आकलन से अधिक जरूरी वे सवाल हैं जो आलीशान उपहारों के कुलीन पैकेटों के नीचे दबे हुए झांकते हैं। जो उपहार देते हैं, वह कौन हैं?

उपहार के एवज में उन्हें क्या फायदे मिलते हैं? प्रदेश का दलित क्या इतना समृद्ध हो चुका है कि वह बेशकीमती उपहार दे सके? पार्टी में पद, प्रतिष्ठा, पैसा, टिकट किस वर्ग को मिल रहा है? सरकार में व्याप्त भ्रष्टाचार के आरोपों पर सफाई पेश करते हुए मुख्यमंत्री मायावती ने विधानसभा के हालिया सत्र में कहा कि उनकी सरकार का कोई भी अफसर, चाहे वह कैबिनेट सचिव हो, प्रमुख सचिव हो, मुख्य सचिव हो या कोई और, इन सबकी बड़ी साफ छवि है और ये अपनी ईमानदारी और प्रतिबद्धता के लिए मशहूर हैं। मायावती ने विधानसभा के भीतर हास्य में यह बात नहीं कही थी। लेकिन उनका यह गंभीर वक्तव्य समाज में कितना हास्य प्रदान करता है, यह उनके चाटुकार नौकरशाह उन्हें थोड़े ही बताएंगे।

प्रतिष्ठित टाइम पत्रिका ने इस पर कहा भी कि उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती की छवि उनके सिपहसालारों और अफसरों के कारण नीचे गिर रही है।जिस प्रदेश की मुख्यमंत्री दलित हितवादी महिला हो, उस प्रदेश में दलित महिलाओं के साथ बलात्कार की घटनाएं देश भर में सबसे ज्यादा हों, उस हितवाद और वैसी हितवादी कानून-व्यवस्था के बारे में क्या कहा जा सकता है।

मायावती ने 13 मई 2007 को उत्तर प्रदेश की सत्ता संभाली। उस तारीख से 31 मार्च 2008 के बीच दलित महिलाओं से बलात्कार की 271 घटनाएं घटीं। बलात्कार की ये वो घटनाएं हैं जो काफी जद्दोजहद के बाद पुलिस ने दर्ज कीं। इनमें उन घटनाओं को हमने शामिल नहीं किया, जिनकी सूचनाएं अखबार तक पहुंचती हैं पुलिस से दुत्कारे जाने के बाद। तब तक काफी देर हो चुकी होती है। हम उसे जन अदालत के समक्ष जनहित याचिका के बतौर पेश तो करते हैं, लेकिन वे मामले सरकारी दस्तावेजों में शुमार नहीं होते। हम ऐसे ही प्रदेश में रहते हैं, जहां दलित से बलात्कार में पुलिस भी लिप्त रहती है और थाने बूचड़खाने की तरह बलात्कारखाने में तब्दील हो चुके हैं।

अगर हम उन आंकड़ों और घटनाओं को भी सरकारी आंकड़ों में शामिल कर लें तो भयावह दृश्य दिखाई पड़ेगा। मायावती शासन के 10 महीने में 215 दलितों की हत्या हुई। यह चिंतनीय इसलिए भी है क्योंकि यह वो सरकार है जो दलितों के लिए आठ-आठ आंसू रोती है और दूसरा कोई रोता है तो उसे कोसती है... रूखसत हुआ जो साल तो महसूस यूं हुआहर माह हसरतों का लहू चूसता रहा


...प्रभात रंजन दीन